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Vijay Kumar parashar "साखी"

Drama Tragedy

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Vijay Kumar parashar "साखी"

Drama Tragedy

"खोया बचपन"

"खोया बचपन"

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खो गया है, मेरा आजकल मोबाइल में बचपन

कैसे लाऊं वो रोकर भी मुस्कुराता हुआ, बचपन

अब नहीं रहा खेतों में वो चोरीछिपे कैरी तोड़ना

ओर न रहे, माली को छकानेवाले वो टोली सुमन


पहले था दोस्तों के साथ में वो लड़ना-झगड़ना

अगले ही पल खेलने हेतु मनाने का लगाते चंदन

पहले नहीं था मनमुटाव का भीतर विषधर भुजंग

आजकल छोटों को क्या कहे, बड़ों के बिगड़े मन


आजकल जरा सी बात पर खींच जाती है, भौंहें

कृष्ण होते जा रहे है, आजकल तो बचपन कुंदन

आधुनिक सभ्यता ने छीन लिया सुनहरा बचपन

अब न रहा फिजा में वो आनंदित बचपन अमन


बच्चों के साथ समय बिताए, न दे मोबाइल दुश्मन

बच्चो को बताएं, अपने बचपन की वो यादें चंदन

जिनके स्मरण से आज, भी महकता, हृदय उपवन

बच्चों को खुला मैदान दे, जीने दे, नीचे उन्मुक्त गगन



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