STORYMIRROR

Alka Nigam

Drama

3  

Alka Nigam

Drama

ख़ाली लिफ़ाफ़ा

ख़ाली लिफ़ाफ़ा

1 min
273

हाँ लिखा था मैंने

एक ख़त तुम्हारे नाम का

जिसमें ज़िक्र था तुम संग

गुज़ारे सुबहो शाम का

यादोँ की सियाही में डूबा


हर इक हर्फ़ था

पर वक़्त का कहर

बड़ा ही कमज़र्फ़ था

कुछ यादें झूलती थीं

मोगरे की टहनी में

कुछ लम्हें थे रूमानी


ओस में भीगे हुए

कहीं मात्राएँ मौन थीं

कहीं अल्प से विराम थे

कुछ शामें थीं थकी थकी

कुछ चाँद पूरे नाम के


दामिनी की दमक संग

कुछ बूँदें थी बरसात की

जो दास्ताँ करती थीं बयाँ

हमारे जज़्बात की


टेसू के फूलों में

भीगे हुए लम्हों से

रँगा था मैंने काग़ज़

हमारे एहसास का

इत्र सा महकता


जहाँ हर अल्फ़ाज़ था

और सुरीली सी ख्वाहिशों का

जहाँ एक परवाज़ था

पर यादों और अश्कों के समंदर में डूबे

ख़त को न भेजने की ख़ता में कर आई।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Drama