खामोशी vs तन्हाई
खामोशी vs तन्हाई
आगे खामोशी थी, और पीछे तन्हाई थी
बोलने को तो लफ़्ज़ बड़े थे लेकिन
समझने को परछाई भी नहीं थी
मंज़िल की भी हसरत थी वो
खामोशी की भी ज़रूरत थी
मुकद्दर की खामोशी भी थी
और अपने लम्हों की सच्चाई भी थी
चुप रहते तो टूट जाते
बोलते तो बिखर जाते
सोचा दर्द को ही दोस्त बना लें
कम से कम वो तो साथ निभाते
अब ना शिकवा तुझसे, ना शिकायत खुद से
बस ये खामोशी ही अब मेरी ताक़त है।
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