वीरान मंदिर
वीरान मंदिर
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अपने स्कूल को देखा आज,
पहचान ही नहीं पाया मैं।
जहाँ हँसते खेलते थे हम,
वहाँ खामोशी रोता है।
दीवारों का रंग उड़ गया,
दरवाज़े से घास उग आई।
जो मंदिर था बचपन का,
आज वीरान क्यों हो गई?
मन करता है पूछूँ इससे,
कहाँ गए वो दोस्त पुराने?
कहाँ गई वो घंटी की आवाज़,
जो दिल को सुकून पहुँचाती थी?
बुरा हाल देख के इसका,
आँख भर आई मेरी।
ये स्कूल नहीं टूटा,
मेरा बचपन बिखर गया है।
😩😓😓😢
