अपनों के जख्म
अपनों के जख्म
कोई दुश्मन नहीं है मेरा इस दुनिया में
फिर भी हर रात आंखें नम रहती है
दुश्मन तो वार करके चला जाता है
अपने तो हर मुलाकात पर जख्म देते हैं
हैरान हूं मैं इस बात से कि
गैर तो शिकायत करते हैं मुझसे
अपने क्यों बिन वजह नाराज रहते हैं
और अपनी ही सांसों से गला घोंटते है
सूरज भी डूब जाता है किनारे पर
जब मै अपने बिखरे हिस्से समेटती रहती हूं
कोई दुश्मन अपना न होने पर भी
मैं हर दिन हार रही हूं
मैंने हर बार माफ कर दिया उन्हें
क्योंकि रिश्ते निभाना सीखा था
पर अब समझ आया मुझे
माफी भी कब तक दोहराऊं मैं
जख्म भरते नहीं अब मेरे
क्योंकि मरहम भी अपनो के हाथ से अपना है
और वही हाथ चाकू चलाता है
