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Simmi Negi

Tragedy

4.8  

Simmi Negi

Tragedy

रात की स्याही

रात की स्याही

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बुरे कल के पन्ने पलटती हूं मैं 
हर सुबह से थोड़ा डरती हूं मैं 
पर रात की स्याही में ही तो 
सुबह का उजाला लिखती हूं मैं 

जो तो‍ड़ गया वो पाठ पढ़ा गया 
जो छोड़ गया वो हुनर दे गया 
तजुर्बे की किताब बंद नहीं होती 
हर ठोकर संभलने का अध्याय देती है 

नाम मिट गए पर निशान रह गए 
हंसी छीन गई पर आँसू रह गए 
जिन्हें अपना कहा है वो अजनबी बन गए 
और मैं खुद से ही अनजान बन बैठी 

वक्त सिखाता है पर कीमत बहुत लेता है 
दिल का एक टुकड़ा हर सबक पे देता है
फिर भी कलम रुक ना पायी
क्योंकि लिखना ही अब सुकून सा लगता है


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