STORYMIRROR

Archana kochar Sugandha

Tragedy

4  

Archana kochar Sugandha

Tragedy

कभी सोचा ना था

कभी सोचा ना था

1 min
218

कभी सोचा ना था 

जिस अँगना में जिंदगी ने

रोते हुए किया था पदार्पण 

उसने मेरी हँसती-मुस्कुराती किलकारियों पर 

किया था समर्पण । 


अपने पलक-पावड़ों पर बिठाया था 

शुचि भाव से गले लगाया था।


सहे उसने मेरे सारे नाज़-नखरे थे 

मेरे नटखट शरारती अंदाज 

उसे कभी नहीं अखरे थे।

कायल करती थी उसे मेरी चंचल-चपल

अदाएं दिल-जान से दी उसने मुझे सदाएं।


अरमान जिस पर मैंने हसीं ख्वाबों के सजाएं थे

उस अँगना को अपना कहने के 

अरमान मेरे सारे पराए थे। 


डोली उसने मेरे अरमानों की सजाई 

किस्मत में लिख दी विदाई।


कभी सोचा ना था 

जिस अँगना के सीने से लिपट-लिपट कर थी रोई

उसके गले में थी अपने वारिस के नेम प्लेट की पिरोई

उसके जर्रे जर्रे ने लिखी मेरी इबादत पराई।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy