STORYMIRROR

कभी पास कभी दूर

कभी पास कभी दूर

1 min
301


कभी पास कभी दूर

हम दोनों कितने मजबूर

वादों, यादों का मौसम बीता

अब है तन्हाईयों का दौर

तुम मुस्कुरा कर झूठ कहो कि

मैं खुश हूँ अंजान रिश्ते से...


फिर भी पता है सनम

तुम भीड़ में भी अकेली हो

चाहे दुनिया का मेला लगा हो चारों ओर ...

एक अजनबी से झूठा रिश्ता जोड़ना फिजुल है तेरे लिये

लौट के वापस दिन आयेंगे नहीं याद रखना

बस एक इशारा कर दे हम तुम बने है

एक दुजे के लिये...


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Romance