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Devendraa Kumar mishra

Tragedy

4  

Devendraa Kumar mishra

Tragedy

जिन्दा लाशें

जिन्दा लाशें

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ये जो तुम्हें दिखते हैं जिंदा 

ये सब लाशें हैं चलती फिरती 

इसलिए तो इनके मरने का अफसोस नहीं होता

लाशों के मरने का कैसा मातम 

ये लाशें बहुत बड़ी तमाशाई हैं 

ये लाशें तालियां बजाने में कुशल हैं 

ये लाशें रोती भी बहुत अच्छा हैं 

कहीं फसाद हो तो ये लाशें भागने में मैराथन के धावकों से भी तेज हैं 

सड़क पर कोई मर जाये या घायल हो जाए 

ऐसे में ये लाशें टीका टिप्पणी, आलोचना में भी दक्ष हैं 

ये लाशें बिलों रूपी मकान में रहती हैं 

इनसे कोई उम्मीद रखना व्यर्थ है 

लाशें दफनाई जाती हैं, जलाई जाती हैं 

इन्हें ठोकर मारो, लूटो खसोटो, आतंकित करो 

ये चुपचाप रहेंगी 

इन लाशों की माँ का चीर हरण हो 

तिरंगा लहू-लुहान हो 

इनकी सर्वोच्चता (संसद) पर हमला हो 

इनकी भूमि लूटी जा रही है 

इनके घर द्वार बारूद से उड़ाए जा रहे हैं 

इनकी बहनो को बेबा, भाइयों के सिर क़लम किए जा रहे हैं 

ये चुप हैं लाशें जो हैं 

सरकार वैश्या वृत्ति के लायसेंस दे रही है

बेरोजगारी का विकराल सागर हो रहा है 

भाई भतीजा बाद, अकाल, बाढ़, महंगाई, भुखमरी की खाई रोज गहरी हो रही है 

नकली दवाओं का बाजार, दहशत, दंगा, अश्लीलता का प्रभाव 

यूरिया, फास्फेट की नस्लें चुप हैं 

लाशें जो हैं 

शादी करके बच्चा पैदा करने वाली लाशें 

इनसे परिवर्तन की उम्मीद मत रखना 

ये वोट देकर नया बजट लेते हैं 

ये टैक्स की मार झेलते हैं 

अधिक ताप से पानी भी उबल जाता है 

मगर इनका लहू केवल बहने के काम आता है 

इन्हें सड़ने दो, गलने दो, मरने दो, सोने दो 

लाशें हैं बेचारी, चलती फिरती लाशें. 



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