STORYMIRROR

Pratima Devi

Tragedy Others

4.5  

Pratima Devi

Tragedy Others

ज़िंदा हूँ अभी--!

ज़िंदा हूँ अभी--!

2 mins
8

एक भीड़ --
उस भीड़ में गुम-सी हुई मैं!
कोई हो, जिसे मैं पहचानती !
पर-- शायद नहीं!
सभी अनजान से ख़ुद में व्यस्त!
इधर-उधर देखती मैं!
अनजान बुत से सिर झुकाये,
मोबाइल पर लगे --
जैसे किसी शोध में लगे हों

तभी, एक पहचाना-सा
चेहरा देख, खुश हुई मैं--
कोई तो है, जो अनजाना नहीं।
पहचानती हूँ उसे मैं।
लेकिन यह क्या-
वह शायद मुझे नहीं पहचानती!
विस्मित हूँ मैं---
नहीं पहचानती मुझे, क्यों?
कई बार-- हर बार--
जाने कितनी बार--
साथ गुजरे-
साथ चले-
साथ-साथ कई यादें लिए--

पर आज--
कुछ धूमिल यादों को साथ लिए,
बेखबर-सी चुप है!
जाने क्यों--?
आँखें निर्विकार-सी,
सियाही से लब-
गुम हुई खिलती हँसी,
ढेरों सवाल छोड़ मुझमें-
वह उठी, भाव-शून्य सी,
निकल गई--
मैं बुत बन खड़ी चंद क्षण--
कोई जवाब नहीं--!

तभी! वह लौट आई--
अनमनी-सी।
अनगिनत सवाल लिए--
मैं टूट गई हूँ!
उसके सूखे आँसू देख--
सियाही लब! जो कभी गुलाब थे।
आज उन लबों पर मुस्कान नहीं।
मैं चकित हो निहारती उसे-
जैसे कुछ टूट रहा है मुझमें--
कभी ज़िंदादिल थी वो!
आज दिल ही नहीं शायद--

मैं एकटक देखती उसे-
वो मुझे।
अचानक उसके लब हिले--
आँखें छलक पड़ी--
वह बेदम सुध-बुध खोई-सी।
मुझसे लिपट गई-
किसी बेल-सी।
सूखे आँसुओं को बहाकर--
जैसे कई सियाही रातों के बाद
हल्की रोशनी दिखी उसे

मैं भी आँसुओं से सराबोर--
वह भी आँसुओं से भीगी हुई।
मुझमें अब भी कुछ टूट रहा है-
उसे देख-देख बेखबर-सी हुई मैं।
तभी कुछ अस्फुट स्वर --
मेरा, नारी होना ही,
मुझे आहत कर रहा।
जो कल मेरा था, सिर्फ़ मेरा--
आज वह क्यों--
नीरवता में डूब रहा।
जैसे कह रहा हो--
बस तेरा नहीं अब कुछ --

मैं एक कठपुतली मात्र!
सबके हाथों की--
पैरों में बेड़ियाँ मेरे,
सबकी निगाहों की।
मेरी हर आहट पर-
वो नज़र रखते हैं!
मेरी हर आस-
छूट रही है, क्यों?
मैं, मैं न रही जैसे-
वह बनती जा रही हूँ।
टूटे हुए सपनों को संजोती-
अब भी खिलखिला रही हूँ।
क्योंकि ज़िंदा हूँ मैं अभी--!


By Pratima Devi


-----🌸🌸🌸🌸🌸🌸-----



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy