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Sanjay Jain

Tragedy

3  

Sanjay Jain

Tragedy

शहीद

शहीद

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201

बंद कमरा दिखा खिड़कियाँ रो पड़ी

कान सूने दिखे बालियाँ रो पड़ी


लौट कर आया जब शव तिरंगे में तो

हाथ की वो सभी चूड़ियाँ रो पड़ी


कौन लाडो हमें अब कहेगा यहाँ

सोचते सोचते बेटियाँ रो पड़ी


एक कोने में जब रो रही थी बहन

इक कलाई दिखी राखियाँ रो पड़ी

           

खेलते थे कभी रंग से फाग पर

जब जनाज़ा उठा भाभियाँ रो पड़ी


भीगी पलकें न थी दिल में तो दर्द था

हाल माँ का था वो अस्थियाँ रो पड़ी


देख संजय पिता का वो उजड़ा चमन

बाग के संग में आँधियाँ रो पड़ी


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