इस छत की मुंडेरों से
इस छत की मुंडेरों से
इक पाश था
इस छत की मुंडेरों से।
आज फिर बैठी थी
खामोशी में वहीं पर
इक आहट सी लगी।
मन विचलित हुआ
आँचल को उड़ाया
उस अन्जाने ब्यार ने
फिर उसी प्रश्नचिन्ह
दिशा की ओर
और याद आ गई।
पुरानी आकृतिहीन पथ
मैं खोने लगी लहरों में
लेकिन आखिर क्यों
मेरा निर्जर तो खो चुका है
पाना मुश्किल लगता है
हर पाश टूट चुका है
इस छत की मुंडेरों से।

