STORYMIRROR

Kanchan Prabha

Romance Tragedy

4  

Kanchan Prabha

Romance Tragedy

इस छत की मुंडेरों से

इस छत की मुंडेरों से

1 min
416

इक पाश था

इस छत की मुंडेरों से।

आज फिर बैठी थी

खामोशी में वहीं पर 

इक आहट सी लगी।


मन विचलित हुआ

आँचल को उड़ाया

उस अन्जाने ब्यार ने

फिर उसी प्रश्नचिन्ह

दिशा की ओर

और याद आ गई।


पुरानी आकृतिहीन पथ

मैं खोने लगी लहरों में 

लेकिन आखिर क्यों

मेरा निर्जर तो खो चुका है 

पाना मुश्किल लगता है 

हर पाश टूट चुका है

इस छत की मुंडेरों से।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Romance