इक अनजाना रिश्ता (बैंगनी रंग)
इक अनजाना रिश्ता (बैंगनी रंग)
कभी देखा नहीं, कभी छुआ नहीं
हां, अहसास होता है इसके होने का
ना तुमने कभी बताया, ना मैं जान पाई
इसकी तलाश में बहुधा भटक जाती हूँ
अनगिनत रहस्यों की दुनियाँ में
हर रहस्य के बाद एक और रहस्य
परतें खुलती जाती हैं मगर
इसकी थाह को मापना मुमकिन नहीं
जितना सोचती हूँ, उतना डूब जाती हूँ
सागर सी गहराई, आकाश से भी ऊंचा
इस रहस्य के हर धागे खोल दिए हैं
लेकिन अब तलक मिला नहीं इसका कोई छोर
कभी सहम जाती हूँ, कभी ठिठक जाती हूँ
ना जाने कितने और रहस्य छिपे हैं
इसकी सलवटों में, आज जानना है मुझे
हर रहस्य जो छिपा रक्खे हैं तुमने
अपनी खामोशियों की चादर में
कहीं ये मेरा कोई भ्रम तो नहीं
तुम वही हो ना जिसे कभी पलकों में बैठाया तो
कभी दिल के आशियाने में ठहराया है
कुछ बात जरूर है जो तुम ख़ामोश हो
कुछ बोलते क्यों नहीं
इतनी चुप्पी क्यों, ये कैसा सन्नाटा
गर तुमने चाहा है मुझे तो
इतना हक़ मेरा भी है कि करूं कुछ सवाल
आज तुमसे भी इस बेनाम रिश्ते के बारे में
कहाँ से शुरू होता है, कहाँ ख़त्म होगा
कभी कभी तो शून्य की गहराइयों में
ढूँढती हूँ इसके किनारों को
कभी कभी तो ऐसा लगता है कि
इसकी खोज में दार्शनिक बन गई हूँ
ये सिर्फ़ एक रहस्य नहीं एम एमर हस्यमई
अध्यात्म का शांत समंदर है
जिसके धूमिल पन्नों में समाई हैं
असंख्य अनसुलझी पहेलियां
जब भी देखती हूं तस्वीर तुम्हारी
बस मुस्कुराके नज़रें झुका लेते हो
लेकिन इस रहस्य को रहस्य ही रक्खा
मैं भी कितनी नादान, कितनी मासूम हूं
तुम्हारी मुस्कान की इक झलक से
इस रहस्य को ही अपनी तक़दीर मान बैठी हूँ।
