"हर रिश्ते मे पतझड़"
"हर रिश्ते मे पतझड़"
आजकल हर रिश्ते में ही हुआ पतझड़ है।
हरियाली में भी लगी हुई है, छद्मता जड़ है।।
स्वार्थ की रेत में सूखी हुई, आज हर नद है।
दरिया में भी रहकर प्यासा रहा, हर कद है।।
क्या मित्र, क्या भाई सबके स्वार्थ की हद है।
आजकल स्वार्थ की फ़लक सी हुई जद है।।
जब तक यहां साखी तेरे पास पैसे नकद है।
रिश्तों की तेरे पास, फैली होगी, बड़ी सरहद है।।
जिस दिन होगा, तू एक मुफ़लिसी का पद है।
लगेगा खुद का साया भी कर रहा, जैसे वध है।।
छोड़ सबको खुश करना, यह स्वार्थी जगत है।
काम हुआ, फेंकेंगे मक्खी जैसे कमबख्त है।।
यहां पर हर रिश्ते में लगी हुई स्वार्थी रज है।
स्वार्थ हो तो लोगों को मधुर लगता लवण है।।
जो छोड दे, सब प्रकार के रिश्तों की भगदड़ है।
वो रिश्तों के मकड़जाल से निकलता ध्वज है।।
जो भव दरिया में रहता निरन्तर प्रयासरत है।
वो खोज ही लेता मोती, गहराई में ज़बर्दस्त है।।
