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अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

Tragedy Action Inspirational

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अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

Tragedy Action Inspirational

हर जगज कौड़ी नहीं चलती

हर जगज कौड़ी नहीं चलती

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हर जगह कौड़ी नहीं चलती,

गर चलती तो साँस नहीं ढलती।


साथी नहीं रुकता कभी पांव से ,

पथिक नहीं थकता कभी छांव में।


पहले हसीं फिर जग हंसाई हुयी है,

दांतों तले ऊँगली सदा इतिहास हुयी है।


दुरस्त-ए-कोशिशें कब नाकाम हुयी हैं,

जुस्तजू-ए-महफिलें अक्सर मुकाम हुयीं है।


जो आज मशालें जलती हैं,

वह दिन में उजाला चाहतीं हैं।


कितना भी तुम गौर करो,

जिन्दगी का ठौर नहीं होता,

हो सके तो अब लौट चलो,

बंदगी का रौब नहीं होता।


भले ही हो यह मेरा फसाना,

अंजाम दूंगा क्रांति ही कारवां।


कहीं का फसाना कहीं की रंगत है,

यह दुनिया आदमी की फितरत है।


यह मेरा नशीब नहीं मेरी आरजू है,

अकेला और कारवां से जुस्तजू है।


ऐसा नहीं कि मैं हार गया हूँ,

मुकाम-ए- नजर में भाग गया हूँ।


हाँ कुछ इरादे और कुछ अंजाम,

मैं दुनिया की नजर पहचान गया हूँ।


यह जिन्दगी जिधर ले जाएगी,

तमन्नाएं वहां ख़ाक हो जायेंगी।


समझना हमको है साथी पथ का,

हवाएं तो जहां तहां रुक जाएगीं।


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