हर चित्र बोलता हैं
हर चित्र बोलता हैं
बोलता हैं हर चित्र यहाँ,
कण कण भी बोलता है,
देता कुछ नई सीख सदा
रहस्य जीवन के खोलता है,
प्रहावित होती जहाँ,
भाव संवेदनाओं की गंगोत्री,
उसी अंतस में उपजती
कुछ सुविचारों की उत्पत्ति,
फिर सीखा जाता है हर चित्र भी,
गुरु जैसा ज्ञान देकर,
हो जाता फिर दर्शन भी
समर्पण भाव में जी कर,
कितनी सुंदर धरा हमारी,
हर रूप में सिखाती है,
कमियां कुछ हमारी है,
जो नज़र न आती है,
चलो आज फिर से सीखे,
वसुधा के हर चित्र से,
कर धारण वह उपहार भी,
मुस्काये आज जीवन में,
बस सीखना है कण कण से आज,
उस महान से ज्ञान को,
प्रकृति संग प्रकृतिमय हो,
देना है सम्मान को,
यही तो जीवन मर्म,
और कहाँ कुछ शेष हैं,
बना इसी से निज जीवन
बहुत बहुत विशेष हैं,
न लाये थे, न ले जाना,
धरा का धरा पर रह जाना,
तो सीखे हर एक चित्र से,
कुछ हँसना कुछ खिलखिलाना।।
