हे बटोही ठहर जा
हे बटोही ठहर जा
हे बटोही ! ठहर जा, इतिहास की सुनले गवाही
खून की प्यासी इसी पथ पर खड़ी है दंड-शाही।
राष्ट्र पहली प्राथमिकता हो, इसी पथ पर सुनोगे
बात सुन अच्छे दिनों की बाद में तुम सिर धुनोगे।
श्रेष्ठता के दंभ ने बैरी यही चिन्हित किए थे
घोर नरसंहार के अवसर इसी पथ ने दिए थे।
माध्यमों ने रूप नेता का करिश्माई गढ़ा था
दोष अपनी विफलता का दूसरों के सिर मढ़ा था।
बुद्धिजीवी जेल में डाले गए, मारे गए थे
जो मरे, दोषी बताए, छूट हत्यारे गए थे।
पुस्तकें इतिहास की बदली, जलाई भी गई थीं
लेखकों विद्यार्थियों को यातनाएं दी गई थीं।
झूठ की ऐसी हुई भरमार सच मर-सा गया था
भावनाओं को उभारा और भड़काया गया था।
अंध-भक्तों का इसी पथ पर महा सैलाब आया
नारियों ने भी यहीं पर था विरोधी स्वर दिखाया।
सुनहरे भवितव्य और विकास के नारे गढ़े थे
मंत्र शासक ने दमन के और हिंसा के पढ़े थे।
लौट जा तू जो गया इस राह पर जाकर मरेगा
ध्वंस तानाशाह तेरा और वध खुद का करेगा।
