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Dr J P Baghel

Others


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Dr J P Baghel

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जलो, जब तक

जलो, जब तक

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जलो, जब तक हो जाए प्रभात !

अंधेरे फैले हैं गंभीर अमावस की है काली रात !

जलो, जब तक हो जाए प्रभात !! 


दूर-दृष्टि की बात कहां, मैं निकट निहार न पाऊं, 

नीरवता चहुंओर भयानक, सोचूं डर-डर जाऊं ।

घूम रहे निर्भीक, अंधेरों के निर्मम व्यवसायी,

जीव अकेला, दीप करे क्या, किसका संबल पाऊं ?


सभी के मुरझा कुम्हला गए अकेलेपन से आकुल गात !

जलो, जब तक हो जाए प्रभात !!


सूख रहे सरिता सर पोखर, सागर में जल जाए, 

नग्न हुए गिरि-श्रंग, सिमटते हरित वनों के साए ।

ठांव उजड़ते, उदर न भरते, श्रम का मोल न कोई,

खोते गरिमा गांव, नगर का मादक रूप लुभाए ।


निशा-भर जलते कहां अलाव, कहां अब चौपालों की बात ? 

जलो, जब तक होगा यह प्रभात !!


राजमहल मदहोश, उनींदे शासन के गलियारे,

सांठ-गांठ में लीन पहरुए करते हैं बंटवारे ।

हूक हिए में लिए तड़पते पल-पल बोझिल मन के,

देख रहे थे स्वप्न सजीले लोचन व्यर्थ हमारे ।


हमारा धर्म सहज बलिदान, सुफल का अधिकारी अभिजात ! 

जलो, जब तक हो जाए प्रभात !!



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