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Ayushi Akanksha

Tragedy

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Ayushi Akanksha

Tragedy

हां ...वो मैं ही हूँ

हां ...वो मैं ही हूँ

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कुछ एक पन्नों पर किताब के सबला 

तो कुछ पन्नों पर अबला बन रह जाती हूं

मैं वो चुप्पी हूं आज के इस शोर में भी 

जो चाह कर भी कुछ न कह पाती हूं ।

मैं वो पुष्प हूं बगिया की

जो घर आंगन महकाती हूं

फिर यूं ही चंद कर्मों के लिए

अक्सर तोड़ ली जाती हूं।

मैं वो शक्ति हूं इस जग की

जो हर ज़ख़्म सहती जाती हूं

और वो हल्कापन हूं तुम्हारे मन का

जो तकलीफ में तुम्हारे आंसू बन बह जाती हूं ।

वो हाथ जो भूख पर तुम्हारे तवे पर जल जाती है

और तुम्हारे लिबास सिलते सिलते

जिसकी उंगलियां अक्सर सिल जाती है ।

हां वो हाथ भी मैं ही हूँ 

जो ज़ख़्म पर तुम्हारे मरहम लगाती जाती हूं 

और क्रूरतापन से तुम्हारी लहूलुहान कर दी जाती हूँ ।

उन खुली हुई लटों की तारीफें 

जो हर शायरों द्वारा कर दी जाती है

वो लटें हवाओं के झोंकों के साथ थिरकती नहीं 

अपितु अपने दर्द बयां करते जाती है ।

हां वो ही लट हूं मैं 

जो किसी की खूबसूरती का हिस्सा बन जाती हूं

और वास्तव में मैं खुल कर गरदन पर पड़े

कई जख्मों को छुपाती हूं ।

पायल रूपी चाहतों से सजे पांव जो 

हजार ख्वाहिशों के साथ 

खुशियों की आस सजाए आती है

तुम्हारी चाहतों की खातिर जो 

अक्सर भगाई जाती है।

हां वो पांव भी मैं हूं 

जो नर्तकी न होते हुए भी पूरे घर में थिरकती जाती हूं

तुम्हारी सोच के कारण पायल से भी जुदा कर दी जाती हूं।

और कितना बयां करूं कौन हूँ मैं 

मैं वो हूं जो अक्सर चरित्रहीन कह कर तवायफ करार दी जाती हूं

हां वो होंठ भी मैं ही हूं 

जो सामने हर वक्त हंसते हुए 

भीतर के सारे जख्म छुपाती जाती हूं।


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