गृहिणी
गृहिणी
करती रहती दिन भर काम
कभी ना मिलता है आराम
खुद के बारे में बिन सोचे
करती भागा दौड़ी में सुबह से शाम
बिना पगार नौकरी करती
गृहिणी वो कहलाती है
थक कर कितनी भी चूर हो
फिर भी सारा भार उठाती है
घर के सारे कामों को
बेझिझक निपटाती है
घर की सारी जिम्मेदारी
अपने सिर पर उठाती है
आती है बीवी बहू बनकर
नौकर भी बन जाती है
कितनी भी हो दर्द में
फिर भी वो मुस्कुराती है
घर भर के ताने सुनकर भी
सबको स्नेह निभाती है
हां बस गृहिणी ही है
जो खामोश रह कर
खुद से भी नज़र छुपाती है
हां इस नौकरी को करना
इतना आसान नहीं होता
जो सह जाती है सब हंसकर
उसको ही कोई नहीं समझता
हां एक गृहिणी बनना इतना आसान नहीं होता
हां ये नौकरी करना आसान नहीं होता
