ग़ज़ल
ग़ज़ल
समय के साथ सारे ग़म निकल जाए तो अच्छा है,
उसे हम भूल गए, वो हमें भूल जाए तो अच्छा है..!
नदी या गुलशन, ये सारी बहारें अब बदल गई हैं,
अब हम भी यहां थोड़ा बदल जाए तो अच्छा है..!
ज़माने की नज़रों में पूरी तरह गिरे हुए हैं हम,
अभी बस लड़ खड़ा के संभल जाए तो अच्छा है..!
उनसे जुदा हुए तब से धड़कने रुक सी गई हैं,
ख़ुदा अब फिर से सांसें चल जाए तो अच्छा है..!
तुम्हारी दी हुई सारी चीजें मैंने जला दी है,
अभी ये दिल से यादें भी जल जाए तो अच्छा है..!
न पत्थर बन सके न कोई शीशा बन सके हम,
अभी बस किसी सांचे में ढल जाए तो अच्छा है..!
अकेलेपन में कब तक जीयेंगे 'कैलाश' बताए,
सभी के साथ अब घुल-मिल जाए तो अच्छा है..!

