पेड़
पेड़
अब दिन-ब-दिन झुक रहा है पेड़।
बढ़ने में पहले से रुक रहा है पेड़।।
प्राणदाता है पर कद्र ना की मानव ने,
इसी वजह से मुंँ पे थूक रहा है पेड़।।
चट्टान की तरह फैल के छांव देता है पर।
कुल्हाड़ी से कटा बड़ा नाज़ुक रहा है पेड़।।
जब पेड़ ने मानव को औकात दिखाई तब।
चीख के बोला मेरा तुझसे ताल्लुक रहा है पेड़।।
दिक्कत हुई सांस लेने में बचाने पेड़ ही आया।
उनका मूल कठोर है पर बड़ा नाज़ुक रहा है पेड़।।
