ग़ज़ल *जमाने को सजाना है*
ग़ज़ल *जमाने को सजाना है*
ग़ज़ल *जमाने को सजाना है*
*हमें ही तो बहारो से जमाने को सजाना है*
*गुलों जैसे महकना भी हमे ही तो सिखाना है...!!*
*मुहब्बत हो इबादत सी तभी हरदम सजा करती*
*इनायत को मुहब्बत की हमे ही तो बनाना है....!!*
*कभी हमको हंसाती है कभी ये ही रुलाती है*
*खुशी या गम मिले जो भी मगर हमको निभाना है...!!*
*उन्हें देखा सलामी दी हुई उल्फत इबादत सी*
*हमे अहसास जो होता उन्हें ही तो दिखाना है.....!!*
*गुजर होती रहे जब तक इश्क दिल में बसाया हो*
*सनम को गर्दिशो में भी नहीं मंजर दिखाना है...!!*
*मुहब्बत की दिले-नादा सदा तहरीर लिखते हैं*
*हमे भी लुत्फ मिलता है कहें जब वो सजाना है....!!*
*लुटा दिल और हर पल की मिली है बेकरारी भी*
*कहे किससे सुने किसकी इसे ही तो छुपाना है...!!*
*मीनाक्षी किलावत (अनुभूति)

