गज़ल *नहीं बस में सबके रज़ा का सफ़र
गज़ल *नहीं बस में सबके रज़ा का सफ़र
गज़ल *नहीं बस में सबके रज़ा का सफ़र।*
*कहा है इसे कर्बला का सफ़र।।*
*भरोसे के रिश्ते बिखरने लगे।*
*गुज़रने लगा जब दग़ा का सफ़र।।*
*सरे-अर्श पहुँची है दिल की सदा।*
*कहाँ रुक सका है दुआ का सफ़र।।*
*महज़ जिस्म तक ही नहीं मुनहसिर।*
*रग-ए-जाँ तलक है दवा का सफ़र।।*
*दिलों में है बाक़ी अभी कुछ हया।*
*चले आ, रवाँ है वफ़ा का सफ़र।।*
*यहाँ काटते हैं कई बेगुनाह।*
*सलाखों के पीछे सज़ा का सफ़र।।*
*दिया ज़िंदगी ने बक़ा का फ़रेब।*
*किया उम्र भर बस क़ज़ा का सफ़र।।*
*हर इक मोड़ पर इम्तिहाँ है यहाँ।*
*के मुश्किल बहुत है अना का सफ़र।।*
*बशर तब तलक कोई अब है नहीं।*
*किया हो न गर इर्तिका का सफर.*
*है क़ैद-ए-हयात इक मरहला-ए-ज़ीस्त।*
*फ़ना से गुज़रता है बक़ा का सफ़र।।*
मीनाक्षी किलावत (अनुभूति)

