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Meenakshi Kilawat

Romance Tragedy Classics

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Meenakshi Kilawat

Romance Tragedy Classics

ग़ज़ल-गरीबी में भी रौशन जिसका ये ईमान

ग़ज़ल-गरीबी में भी रौशन जिसका ये ईमान

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ग़ज़ल-गरीबी में भी रौशन जिसका ये ईमान
बहर :
1 2 2 2 -  4

गरीबी में भी रौशन जिसका ये ईमान होता है।
पस-ए-पर्दा वही तो साहिब-ए-ज़ीशान होता है।।

नज़र ज़ाहिर पे हो तो ख़ूब नुकसान होता है।
कभी किरदार से मिलिए  वहीं इंसान होता है।।

सिमट कर दर्द माथे की लकीरों में जब आता है।
यही चेहरा दिल की किताब का उन्वान होता है।।

हवस अक्सर मुहब्बत का लबादा ओढ़ लेती है।
मुहब्बत में हवस का तो कहाँ इमकान होता है।।

बदन की क़ुर्बतों को इश्क़ का हासिल नहीं कहते।
नज़र गर जिस्म पर ठहरे तो दिल वीरान होता है।।

सजा ले जिस्म को चाहे जहाँ भर के लिबासों में।
तेरा किरदार तेरे अस्ल की पहचान होता है।।

वो ज़िंदा है जिसने मौत को इक मरहला समझा।
क़ज़ा के ख़ौफ़ से नादान क्यों हलकान होता है।।

ज़माने भर की रखता है ख़बर अफ़सोस है लेकिन।
यही इंसान अपने आप से अनजान होता है।।

तमन्नाएँ मुकम्मल हों तो जादू टूट जाता है।
जो हासिल हो गया उसका कहाँ अरमान होता है।।

ख़ुदा का हुक्म दरिया का भी सीना चीर देता है।
अगर दिल में किसी के ईश्वर का ईमान होता है।।

*ग़ज़ल के दर्द को तो लहू से सींचता हूँ मैं।
बहर में शेर कहना भी कहाँ आसान होता है.।*

मीनाक्षी किलावत (अनुभूति) वणी महाराष्ट्र 


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