गजल और माशूका
गजल और माशूका
तेरी मुलाकात मुझे गज़ल की मिसरा लगती है,
तेरे इश्क का इस्तकबाल मुझे अच्छा लगता है।
तेरी पायल की झनकार मुझे रदीफ लगती है,
तेरे होंठों के मीठे शब्द मुझे काफिया लगता है।
तेरी तिरछी कातिल नज़र मुझे मत्ला लगती है,
तेरे नैनो के अजीब ईशारे मुझे मक्ता लगता है।
तेरी लटक-मटक ये अदाएं मुझे बहर लगती है,
तेरे इश्क की गज़ल का मुझे बंधारण लगता है।
तेरी हर धडकन मुझे रंगीली महफिल लगती है,
तेरे दिलमें बसना 'मुरली' को अनमोल लगता है।
रचना:-धनज़ीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ - गुजरात)

