दिव्यांजलि
दिव्यांजलि
जिसने करना प्यार सिखाया,
यह काव्यांजलि उसके नाम,
रुद्राक्ष सा जापति जिसका नाम,
यह पुष्पांजलि उसके नाम,
बदन मेरे जो श्वास भरे,
यह गीतांजलि उसके नाम,
देह मेरी जो झुलसाए,
यह श्रद्धांजलि उसके नाम।
मेरे जोबन को निरखता जाये,
कण-कण को मेरे एकत्रित कर,
जो अस्थि मेरी संजोता जाये,
यह तिलांजलि उसके नाम।
जिसको पहले दिल दिया, फिर छोह और मोह,
उसके चरण को अर्जित करती,
यह प्रांजलि उसके नाम,
विराज विनय की प्रतिमा अपार,
जैसे श्रवण मैं नीरद विशाल,
जिसे देखे दिन न कटे,
यह शिवांजलि उसके नाम।
कभी मेरे दिल ने कहा न हो,
ऐसा कुछ अब होने लगा,
तुम्हारे होते हुए भी,
तुम्हें खोने का भय होने लगा,
यह विसर्ग की विभूति,
अब छलनी करती मन को मेरे,
यह विलापांजलि उसके नाम।
मैं न सुनती जग की बातें,
खोखली नसीहत खोखले झांसे,
अब प्रीत जगी मन मोरे,
यह रक्तांजलि उसके नाम,
रही रहे अब एक दुआ,
की प्राण तेरे दर पर निकले,
श्वास तेरे मुख में त्यागूँ,
और तेरा नाम मेरे दिल में धड़के ,
करती प्रार्थना ये अभिलषित प्रेमिका,
अब एक ही भजन करती हैं,
यह दिव्यांजलि तेरे नाम,
यह दिव्यांजलि तेरे नाम।

