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Vijay Kumar

Romance

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Vijay Kumar

Romance

दिल न मचल जाए

दिल न मचल जाए

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चलती हवा का तेज झोंका भी

तुझे छूने से न जाने क्यों कतराए

उसे डर है कि कहीं तेरे खूबसूरत चेहरे पर

तेरे जुल्फों का कोई पर्दा न बन जाए,


 सूरज की चमकती तेज किरणें भी

तेरे पास आने से न जाने क्यों घबराए

उसे भी शायद यही डर है कि

तेरे होठों से कोई आह न निकल जाए,


फूलों की उन नाजुक कलियों को

अगर तेरे छूने से ही ताजगी मिल जाए

तो मुझे डर लगता है कि कहीं

तेरी नाजुक कलाइयों में कोई मोच न आ जाए,


बारिश कि वो रिमझिम - रिमझिम बूंदे

 तुझ पर बरसने से ही मुकर जाए

 उसे डर है कि तेरे भीगे बदन की खुशबू से

 कहीं वो मदहोश न हो जाए,


तेरे रास्तो के वो कंकड पत्थर

तेरे रहो में आने से शर्मा जाए

उसे दुःख होगा तेरे नाजुक पैरों के नीचे आने से

तेरे पैरों मे कहीं कोई लचक न आ जाए,


बन ठन के इतराती इठलाती हुई

 जब ऊंची - नीची पगडंडियों मे अपने कदम बढ़ाए

 मुझे फिक्र है तेरे लिए इस बात की

 कि कहीं किसी का दिल न मचल जाए।


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