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Kishan Negi

Abstract Classics Thriller

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Kishan Negi

Abstract Classics Thriller

धूप फिसल रही है चुपके चुपके

धूप फिसल रही है चुपके चुपके

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भोर खिली है बन ठनकर 

मंद-मंद मुस्कुराता दिनकर 

जिंदगी की धूप निकल रही है चुपके चुपके


सुवर्ण परिधान में लिपटकर 

बसंत ऋतु आयी सिमटकर 

यौवन की कलियाँ खिल रही हैं चुपके चुपके


हिमशिखर से निकलकर 

दृढ चट्टानों से फिसलकर 

समंदर से नदिया मिल रही है चुपके चुपके


पूरब दिशा से चली है पौन 

बाहें फैलाये दरख़्त हैं मौन 

डालियों पर हरी पत्तियां हिल रही हैं चुपके चुपके


हटाकर बुढ़ापे की सलवटें 

बेबस झुर्रिया लेती करवटें 

जिंदगी उधड़े वक्त को सिल रही है चुपके चुपके


तन्हा-तन्हा आज की रात

कौन सुने तारों की बात 

घूंघट हटाकर चांदनी टहल रही है चुपके चुपके


सूरज डूब रहा है सागर में 

समा गया जल के गागर में 

मदहोशी में गुलाबी शाम ढल रही है चुपके चुपके


तेरे नयन जैसे शरबती जाम 

क्षितिज में अलसाई है शाम 

पहाड़ों में चटकी धूप फिसल रही है चुपके चुपके।


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