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कवि काव्यांश " यथार्थ "

Abstract Drama Romance Tragedy Classics Fantasy Inspirational Others

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कवि काव्यांश " यथार्थ "

Abstract Drama Romance Tragedy Classics Fantasy Inspirational Others

चलो मस्ती के कुछ रंग लुटाए।।

चलो मस्ती के कुछ रंग लुटाए।।

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"चलो मस्ती के कुछ रंग लुटाएँ"

चलो आज कुछ मस्ती के रंग लुटाएँ,
हँसी की हवा में कहीं उड़ जाएँ।

बांध के सपनों की तरंगों को,
आसमां को छू लिया जाएँ।।

धूप है झिलमिलाती सोने सी,
पाँव पड़ें जैसे बहकी तालों में।

बूँदें हँसी की जो बरसे दिल में,
हर ग़म छिप जाए लहराती नभ में।।

छोटे पल में छुपा जहाँ है,
रंग-बिरंगे अरमानों में सजा हैं।

बोलो तो झरना बज उठे,
गीत बने हर लम्हा ताजा हैं।।

छेड़ो ना तुम आज कोई उदासी,
छेड़ो साज खुशी के प्यारे।

जीवन की मस्त गली में,
चलो आज झूमें, नाचें गाएं।।

खुशबू बनके बह चलें हम,
मौसम के इक झोंके जैसे।

बोल बनें मधुर तान बनके,
हर दिल में बस जाएं जैसे।।

टूटे पल भी गीत बनेंगे,
आँखों में मोती सा चमकेगें।

ग़म की राख से खिल उठेंगे,
फूल जो हर साँझ महकेंगे।।

छोटे लम्हें, मीठे फसाने,
कभी पुराने, कभी दीवाने।

सजाएं दिल के गुलशन में,
हर पल हों जैसे अफ़साने।।

चाय की प्याली, ढलती शामें,
बातें अधूरी महकी महकी।

उनमें भी इक सुकून बसा हैं,
खुशियों भी हैं बहकी बहकी।।

पाँव में छुन-छुन पायल जैसे,
मन में बांसुरी की तान बजाए।

तोड़ के बंधन सारे जग सें,
खुशी का कोई गीत गुनगुनाए ।।

हर मोड़ पे खिल उठे गीत
हर राह पे सपने मुस्काए।

दर्द भी हो दावत का हिस्सा,
खुशियाँ बनके संग नचाएं।।

तो चलो ज़िंदगी को बाँधें,
गुलाल भरी उन साँसों में।

जिनमें हो मस्ती, मधुर मिठास,
और रंग भरे अहसासों में ।।




 स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित रचना लेखक :- कवि काव्यांश "यथार्थ"
              विरमगांव, गुजरात।


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