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PRADYUMNA AROTHIYA

Tragedy

3  

PRADYUMNA AROTHIYA

Tragedy

बुढ़ापा

बुढ़ापा

1 min
80


आज वो

बूढ़े हो गये

और कुछ ऊँचा

सुनने लगे हैं।

बड़बोले से बनकर

स्वयं से ही

बातें करने लगे हैं।

आँखें अंदर

धस गईं

और हाथ-पैर

काँपने लगे हैं।

अपने ही घर के कोने में

एक टूटी हुई चारपाई

और अपनों से ही

पराये होने लगे हैं।

ओढ़कर चादर

मैली-सी

बात-बात को

सुनने लगे हैं।

अपनों ने 

जब साथ छोड़ा

मन ही मन

रोने लगे हैं।

आज वक़्त ऐसा आया

खांस-खांस कर

एक रोटी के लिये

पुकारने लगे हैं।

बुढ़ापा किसी को

ऐसा न आये

माँ-बाप औलाद के सामने

झुकने लगे हैं।

बनकर तमाशा

जिंदगी न रह जाये

ऐसी दुआ मन ही मन

करने लगे हैं।



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