बरखा का मधुर गीत
बरखा का मधुर गीत
घुमड़ घुमड़ कर काले बादल
जब नभ में छा जाते हैं,
प्यासी धरती के अधर भी
खुश होकर खिल जाते हैं।
नन्हीं नन्हीं बूंदें जब
आसमां से झरते हैं,
हर पत्ता, फूल, डाली डाली
मग्न हो नृत्य करते हैं।
माटी की सौंधी खुशबू भी
मन को यूँ महकाती है,
बीते बचपन की गलियों में
चुपके से ले जाती है।
कागज की छोटी नांव
सपनों संग मेरे बहती है,
मेरे आंखों में उतर कर
एक नई कहानी गढ़ती है।
सूखे खेतों की उम्मीदें
फिर अंगड़ाई लेती है,
मेहनती हाथों में लकीरें
जैसे किस्मत अपनी लिखती है।
मोर भी मदमस्त हो नाचे
कोयल डाल में कूकती है,
बादल घुमड़ घुमड़ उड़ते
नदियां कल कल बहती है।
इंद्रधनुष के सातों रंग
नभ पर जब छा जाते हैं,
छोटे बच्चे देख इन्हें
खुश होकर इतराते हैं।
हंसी गूंजे हर आंगन में
मन में उमंग छा जाती है,
बरखा की नन्ही बूंदें फिर
जीवन में रस बरसाती हैं।
