धर्म और अकेला युधिष्ठिर
धर्म और अकेला युधिष्ठिर
हिमशिखर भी मौन खड़े थे
हर पग पर फैला मृत्यु का जाल,
एक एक कर बिछुड़ रहे थे
युधिष्ठिर के अपने लाल।
सबसे पहले द्रौपदी गिर पड़ी
थम गई जीवन की डोर,
कितने सपने साथ छूट गए
टूट गई प्रेम की डोर।
आगे फिर सहदेव गिर पड़ा
ज्ञान ज्योति का दीप बुझा,
नकुल भी निःशब्द सो गया
रूप गर्व का चूर हुआ।
अर्जुन का गांडीव मौन हुआ
वीरता हुई निढाल,
जिसके बाणों से काँप जाते थे
रण के बड़े-बड़े भाल।
भीम भी जब धरती पर लुढ़का
थम गई सिंह की चाल,
जिसकी गर्जन से थर्राते थे
पर्वत बड़े विशाल।
आँखों में था सागर उमड़ा
होंठ मगर थे मौन,
दूर खड़ा बेबस होकर
सिसक रहा देखो कौन?
कितनी बार मन ने चाहा
मुड़कर उन्हें उठा लूँ,
भाई, सखा और प्राणप्रिय को
बाहों में अपने सुला लूँ।
पर धर्म की कठोर डगर ने
बाँध दिए थे उनके पाँव,
भाई गिरते रहे राहों में
धर्म ही बना उनका घाव।
हर गिरते कदमों के संग
कुछ उसमें भी मरता था,
जीता केवल यह शरीर था
मन तिनकों में बिखरता था।
लोग कहेंगे स्वर्ग मिला
है ये कैसी अद्भुत जीत,
कौन बताए उस विजेता की
कितनी थी मन में पीर।
सब कुछ पाकर भी खो देना
है कैसी ये विचित्र कहानी,
धर्म बचा पर छीन ली जिसने
जीवन भर की निशानी।
जो सबसे आगे चलता है
वही रह गया अब अकेला,
अपने आँसू पीकर जिसने
दुःख विकट है झेला।
स्वर्ग मिला तो क्या मिला
जब अपनों का ना था साथ,
विजय शिखर भी सूना रह गया
अब कोई ना था उसके पास ।
