भारत मां के सपूत- एकता का स्वर
भारत मां के सपूत- एकता का स्वर
कब तक अपनी अपनी
जाति में तुम बटे रहोगे,
अपने ही देश में रहकर
अपनों को ही गैर कहोगे।।
ये कहां की हैं समझदारी
हिन्दू, गुजराती, मुस्लिम, मराठी
आपस में ही क्यों बटे रहोगे।।
या दमन करोगे उन सरों को
जो जन्में अपनी ही
माटी में,
और अपने ही देश
को बांट रहे हैं।
फैला कर भेदभाव रंजीश में,
अपने ही भाई से अलग करें जो
उसे सबक सिखाना होगा ।।
वर्ना वो दिन अब दूर नहीं
जब अपना देश भी बंट जाएगा,
फिर कहा छुपोगें,
कहा रहोगे,
जब देश का सूरज डूब जाएगा।।
क्या भूल चूके तुम उन
गद्दारों को,
जिनकी बदौलत देश हमारा
बिका गया था,
तब चारों ओर फैली थी अराजकता
देश का कोना कोना दहक गया था।।
उठ रहे जो सर अभी,
उसे
दमन करो, बस दमन करो,
नफरत के जो बीज बोये,
उनका भी तुम
दमन करों, बस दमन करों।।
अब वक़्त आ चुका संभलने का,
एकता की लौ
फिर जलाने का,
हर दिल में अब वतन बसाना है
हर घर में तिरंगा लहराना है।।
ना हिन्दू, ना मुस्लिम कहो
ना उत्तर, ना दक्षिण रहो,
बस एक ही भावनाओं
में डुबे रहों ,
"हम भारतीय हैं",
यही बस हमारी
पहचान कहो।।
भाषा अलग हो,
चाहे रीति अलग हो,
दिल तो एक ही
धड़कता है,
जो लहू बहा है सरहद पर,
हर नस नस में वही
लहू तो बहता है।।
चलो अब सब मिलकर
संकल्प करें हम
ना कोई पीछे, ना कोई पराया हो,
हर आंखों में सपनों का भारत हो
हर दिल में देश प्रेम जागृत हों।।
जहां किसान
मुस्काए फिर से,
जहां मजदूर ना हो कोई लाचार,
जहां बच्चों को शिक्षा मिले,
और बहनों को मिले अधिकार।।
जहां मंदिर–मस्जिद
साथ खड़े हों
ना कोई दरमियानी
दीवारें बनें,
जहां इंसानियत
सबसे ऊपर हो
और हर धर्म,
हर दिल से जुड़ें।।
चलो उठो अब,
बोलो एक सुर में
"जय हिंद" फिर
गूंजे नभ में,
देश हमारा सबसे प्यारा
न हो कभी अब
इसका बंटवारा ।।
यही संकल्प अब दोहरायेगे,
जाति -वादी का
भेद भुला कर,
हर दिल में एकता
का दीप जलाएंगे।
माटी के कण-कण को
अब शीश नवाते जायेंगे,
रखवाले बन इस धरती के
नव युग को अपनायेगे।
कंधे से कंधा मिलाकर
चलना होगा, यही रीत अब बनाएंगे,
तिरंगे की शान जो ऊँचा रहे
यही संकल्प दोहरायेगे।।
जीते जी अब कोई
शत्रु
न दहके सीमाओं पर,
उन्हें उनकी ही
भाषा में
सबक सिखायेंगे ।
सीना तान के वीरों सा
रण में धूल चटायेगे ।
उठें आँख जो भारत पर,
उनको भी सबक सिखायेंगे,
बोल उठों एक सुर में सब —
"जय हिंद!" "जय हिंद!"
का नारा दोहरायेगे।
हर कोना इसका स्वर्ग बने
ऐसा कुछ कर जायेंगे,
चलो उठो अब, फिर से बोलो –
"जय हिंद!", से गूंजें अम्बर डोलों।।
हम भारत माँ के सच्चे सपूत बन
नई कहानी लिख जायेंगे।
जय हिन्द ।। जय भारत।।
स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित रचना लेखक :- कवि काव्यांश "यथार्थ"
विरमगांव, गुजरात।
