बेवफाओं के नगरी में...
बेवफाओं के नगरी में...
बेवफाओं के नगरी में
वफादारों का क्या हश्र होता है
ज़रा कभी हमारी ज़िन्दगी को पढ़ लेना ।।
अकेले रहना मंजूर है हमें
मगर किसी धोखेबाज को
आजमाना मंजूर नहीं ।।
जो मेरा नहीं उसके पास जाना नहीं ।
जो मेरा है उसे सिर्फ ईश्वर ही लाएंगे
हमें कहीं जाने की जरूरत नहीं ।।
अब भी इस बेवफाओं की नगरी में
ईमान विवेक वफ़ा का ही दिया
जलाया है हमने ।
टूटी जरूर हूं पर फिर से खड़ी हुई
और भी मजबूत पहले से ज्यादा ।।
हमने कभी बेवफ़ा के बदले
बेवफाई न की न ही लिया कोई बदला
मगर ना जाने क्यूं बेवफाओं की
गिनती बढ़ती जा रही है इस दुनिया में ।।
बेवफाओं के इस नगरी में
हम जी रहें हैं अकेले
ले के प्रभु शिवजी का नाम।

