बेटे
बेटे
कभी कभी आंखें कुछ देखती हैं मन महसूस करता है और कलम शब्द बना देती है....... अवश्य पढ़ें
बेटियां दहाड़े मार - मार कर रो रही थीं
बहुएं भी रो - रो आपा खो रही थीं
मगर बेटे बैठे थे चुपचाप एक कोने में
न जाने क्यों झिझक रहे थे रोने में
सीना तो फटा जा रहा होगा दर्द से
मगर वो चुप थे जाने किस डर से
क्या ये वही बेटे थे ?
जो मां के न दिखने पर
घर सर पर उठा लेते थे
क्या ये वही बेटे थे ?
जो मां के चोट लगने पर
फूंक फूंककर मरहम लगाते थे
क्या ये वही बेटे थे ?
जो भरे घर में खोजते थे
सिर्फ मां को
क्या ये वही बेटे थे ?
जो मन की बात बोलते थे
सिर्फ मां को
ये क्यों चुप बैठे थे ?
ये क्यों नहीं दहाड़ - दहाड़ कर रो रहे थे ?
इन्होंने क्यों दबा रखीं थी अपनी चीखें ?
मां के जाने का गम तो इन्हें भी
उतना ही रहा होगा
जितना चीख रही इनकी बहनों को
फिर ये क्यों चुप थे ?
किसने कहा था इन्हें
दर्द पीने को
ये क्यों नहीं लिपट पा रहे थे
अपनी मां से अन्तिम बार
ये क्यों नहीं लगा पा रहे थे
अपनी मां को अन्तिम पुकार
ये किसने सिखाया था इन्हें
कि बडे़ लड़के रोते नहीं हैं चीखकर
क्योंकि जब ये छोटे थे तो खूब रोते थे
भर भर आंसू रोते थे
चीख चीखकर रोते थे
मैं हैरान हूं
परेशान हूं
देख नहीं पा रही
मां चली गई
मां जा रही है
अन्तिम सफर पर
और ये बडे़ हुये बेटे
बैठे हैं चुपचाप
बिल्कुल चुपचाप....
