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Roshan Baluni

Children


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Roshan Baluni

Children


"बालपन/बचपन"

"बालपन/बचपन"

1 min 246 1 min 246

बालपन था वो स्वर्णिम जीवन

सुखद-मनोहर-मनभावन।

मिलता नेह सभी से सुन्दर,

और दिल में था अपनापन।

खेल खेलते गिल्ली-डंडा,

पिट्ठू पकड़म पकड़ाई।

सौंधी मिट्टी खूब सुहाती,

धूल- धूसरित था बचपन।।


कोरा कागज सा मन अपना

राग-द्वेष का भाव नहीं।

आस-पास में झगड़ा होना,

हम पे कोई प्रभाव नहीं।।

सुंदर सपने बुनते रहते,

रोज बनाते हम विमान।

बचपन सबसे अनुपम है

बालमन का स्वभाव यही।।


मेले-तीज-त्योहारों की,

उत्सुकता मन में रहती थी।

नव-नव परिधानों से सज्जित

हमारी टोली होती थी।

खाना-पीना मौज बहारें,

संग सखा भी होते थे।

वैर-भाव से दूर कहीं हम

रंग-बिरंगी दुनिया थी।



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