STORYMIRROR

Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Romance

3  

Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Romance

अंतिम पैगाम

अंतिम पैगाम

1 min
279

प्रिय

क्या अब भी गिनती हो

हमारी दूरियों में कितने बसंत जुड़े

दरिया के किनारे कब मिले

एक बार जो बिछड़े

क्या अब भी सताती हैं

बनकर अनचाही यादें


तेरे सपने मेरे वादे

तुम भी नहीं भूली क्या

गलियों और बागों की बातें

अब भी सोचती हो क्या

बचपन के झरोखों से

ढूंढ निकलोगी मुझे

लुका - छिपी के ठिकानों से

व्यवहारिक नहीं सोच तेरा

असम्भव मिलन मेरा- तेरा

दोष किसे दें

इन ललित सुमनों, की मन भौंरे को

धंसता जा रहा दुनियादारी के दलदल में

रुन्धती जा रही आवाज पल - पल में

शायद है यह अंतिम पैगाम तेरे नाम

करूँगा याद तुझे हर सुबहो शाम



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Romance