STORYMIRROR

Vishabh Gola

Tragedy

3  

Vishabh Gola

Tragedy

अब और कितना?

अब और कितना?

1 min
169

घिसूँ कितना खुद को मैं

चमक मेरी कम नहीं

लेगी कितने इम्तेहान तू ए- जिंदगी

घिस कर खुद को 

आखिर में

मिट जाऊं क्या?


अब तो मिला दे मंजिल से

खुदा की नियत भी कहे

समेट के चला दर्द ,जख्म संघर्ष के मैं

आखिर में

बिखर जाऊं क्या?


छोड़ा था जिन्हें गम भुला के

आंखों से निराशा की नमी भुला के

उन्हीं से वापस लिपट जाऊं क्या


घिसूँ कितना खुद को और मैं

आखिर में

मिट जाऊं क्या?


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy