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V. Aaradhyaa

Romance

4  

V. Aaradhyaa

Romance

आया गदराया सा मौसम

आया गदराया सा मौसम

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आया कैसा गदराया सा मौसम री सखी ;

फिर फूलने लगी कैसी पीली पीली सरसों !


       फिर से कैसे पियराये हैं खेत री सखी ;

       जिसके लिए हम तरस चुके हैं बरसों !


महके ये महुआ और महका ये चंदन ;

आने को हैं सजन,होने को है मधुर मिलन !


       उनको बाहुपाश में कसने को बाँहें फैलाये ;

       सिर से मोरी चुनरी भी ढलक ढलक जाये !


निम्बिया की डारी है अब मंजराने को ;

अमराई भी अब है फल से फलिहाने को !


          हरे और काले बूट व चने की क्यारियाँ ;

          फ़सल पक चुकी,कटने की है तैयारियाँ !


शरद के स्वागत में तैयार अलाव भी ;

शरकंडे की आंच पाकर गरमाने को है !


       अब और ना इंतज़ार कराओ मेरे पाहुना ;

       कि तुम्हारे लिए सजाया सारा घर आँगना।



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