आया गदराया सा मौसम
आया गदराया सा मौसम
आया कैसा गदराया सा मौसम री सखी ;
फिर फूलने लगी कैसी पीली पीली सरसों !
फिर से कैसे पियराये हैं खेत री सखी ;
जिसके लिए हम तरस चुके हैं बरसों !
महके ये महुआ और महका ये चंदन ;
आने को हैं सजन,होने को है मधुर मिलन !
उनको बाहुपाश में कसने को बाँहें फैलाये ;
सिर से मोरी चुनरी भी ढलक ढलक जाये !
निम्बिया की डारी है अब मंजराने को ;
अमराई भी अब है फल से फलिहाने को !
हरे और काले बूट व चने की क्यारियाँ ;
फ़सल पक चुकी,कटने की है तैयारियाँ !
शरद के स्वागत में तैयार अलाव भी ;
शरकंडे की आंच पाकर गरमाने को है !
अब और ना इंतज़ार कराओ मेरे पाहुना ;
कि तुम्हारे लिए सजाया सारा घर आँगना।

