आठ कविताएँ
आठ कविताएँ
पतंग
बच्चे पतंग उड़ाते हैं
उनके सपने तैरते हैं
ऊँचे आकाश में
ऊँचे आकाश में ही
सपनों की दूसरी पतंग
काट देती है
और सरल हृदय
आहत हो /कर उठता है.
आर्तनाद
उड़ान
पंख पसारे, चील की मानिन्द
ऊँची और ऊँची / उड़ती है उड़ान मेरी
बादलों के पार
ऊँचाइयों का कोई पैमाना नहीं
अनंत ब्रह्मांड है /ओर-छोर नहीं
त्रिशंकु हुई मेरी उड़ान
आकाश में लटकी
हिचकोले खाती
बिना चप्पू की नांव हो गई है
स्वप्न
मैं सपने बुनता हूँ
रंगीन इन्द्रधनुषी सपने
काश कि पूरा जीवन
ही हो जाता स्वप्न
तीसरी बात
पहाड़ों के चक्करदार
रास्तों पर तेजी से
चलना, एक बात है
और/खतरनाक घूम पर
तेजी से मुड़ना /दूसरी बात.
इस सारी प्रक्रिया को अपने तमाम सन्दर्भों में
घटते देखना / मूक साक्षी की तरह
यह तीसरी बात है.
हवाएँ
हवाएँ सरसराती है
फुसफुसाती है
मेरे कान में
पहचानने लगा हूँ
हवाओं का रुख.
बावजूद इसके
हवाओं के विरुद्ध चलने का
खब्त सवार है मेरे सिर में
सलामत रखना अपना सिर
सावचेत करती है हवाएँ
गीत
फफूंद लगी फसलों पर
गिर गया पाला
आदमी और जानवर का
चेहरा पड़ गया काला
चांदी सा सफ़ेद
हो गया लाला
लाला का कौन
तोड़े अब ताला
उस पर बैठ गया
संतरी मतवाला
गाँव छोड़ चल दिए
रह गया सूखा नाला.
अब तो भैरू का
मुँह करो काला
बूंद
ये क्या हुआ! मन के आँगन में
नूर का जलवा उतर आया है
एक बूंद पानी में
पूरा आकाश उतर आया है
युद्ध
बिजली कड़की
भूकंप आया
आंधी उजाड़ गई
क्रोध और घृणा में भुने लोगों की गंध
हवा में कसैले धुएँ सी फ़ैल गयी
लोह-लक्कड़ की नसें
स्पात की हड्डियां
हजारों थपेड़े खाई मांसपेशियां
डटी रही
टूट गया सुनहरी फ्रेम का चश्मा
लहूलुहान हो गए
मुलायम क्रीम से हाथ
तब श्रम की सौंदर्यमयी
आलोकमयी प्रतिमा
नैसर्गिक मुस्कान लिए
खिलखिला उठी.
