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Kusum Lakhera

Tragedy


4.5  

Kusum Lakhera

Tragedy


आँकडों की बाढ़ में ...

आँकडों की बाढ़ में ...

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आँकडों की बाढ़ में भावनाएँ ....बह गई हैं ...

आज़ादी की गाथाएँ सिर्फ़ किताबों में रह गईं हैं ।

नींव की ईंटों को भुला ..आज कँगूरे बनने की होड़ ।

है ये कैसी आधुनिकता है ये कैसी अजीब सी दौड़ ।

नहीं परवाह कि देश के हित के लिए कुछ कर जाएँ ।

बस एक ही काम की किस तरह से अपनी जेब भर जाएँ ।

भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी और कालाबाजारी के काले कारनामे 

की गिरफ्त में सारा प्रशासन आ रहा है ....

आम साधरण व्यक्ति के जीवन में मानो अमावस का ....

गहन अंधकार छा रहा है .....

आज़ादी के परवानों के सपनो को भूल ये सारा जमाना !

बस औपचरिकताओं के ढोल पर हो रहा है गाना बजाना !!

काश कि यथार्थ में हम आज़ादी के मूल्य को समझ पाते ।

तो शायद हम आम व्यक्ति को रोटी कपड़ा और घर दे पाते !

नहीं उन्हें भूख के लिए , तन ढकने के लिए और सर छिपाने 

के .... अनगिनत डर सताते !


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