आखरी मंजिल
आखरी मंजिल
आखरी मंजिल
पहिले ये दुनिया बड़ी गतिवान लगती थी,
हर कोई समय के साथ दौड़ते दिखाता था।
मैँ भी इन सभी से कभी अछूता नहीं था,
लेकिन तुम्हारे दीदार से समय रुक सा गया।
पहिले हर वक्त समय निकल जाने डर था,
जिंदगी में कुछ खोने का डर सताता था।
लेकिन तुम्हारे इंतजार में समय कैसे भूल गया,
न जाने समय और डर कहा गुम हो गया।
अभी मुझे ना समय और कर्म का ध्यान रहता,
बस खाली तेरा इंतजार ही इंतजार रहता।
ऐसा क्या जादू तूने इस दीवाने पर चलाया,
कल का मासूम किशोर बन गया तेरा दीवाना।
तुमसे पहिले मेरी खास ऊंची मंजिल थी,
दुनिया से कुछ हटकर सपना मैँ देखा था।
लेकिन तुम्हारे अदाओं ने मुझे घायल किया,
और तुम मेरी आखरी मंजिल बन चुकी।
