श्रमिक
श्रमिक
श्रमिक
गरीब, वंचित, मजबूर, लाचार,
कौन सुनता है उनकी पुकार?
वो कब आए, कब जिए, कब मरे,
दुनिया नहीं रखती उनकी खबर।
अपने भाग्य को कोसकर बार-बार,
जी लेते हैं जीवन सिमटकर हर बार।
अशिक्षित, शोषित, लाचार मजदूर बनकर,
गंवा देते हैं जीवन चंद रुपयों पर।
मजदूर न करे श्रम, तो कौन बने अमीर?
इनका ही हक छीनकर बनते हैं अमीर।
धरती नहीं शेषनाग के सिर पर सवार,
टिकी है यह तो मजदूर के हाथों पर हर बार।
मजदूर कर ले अपनी मुट्ठी बंद पल भर,
तो दुनिया का अर्थचक्र रुक जाए वहीं पर।
मजदूर ही हैं इस दुनिया के सच्चे पालनहार,
फिर क्यों समझते हैं खुद को इतना लाचार?
दिखा दो दुनिया को अपनी एकजुट शक्ति डटकर,
प्रकृति ने दिया है तुम्हें श्रम का हुनर।
जिस दिन उठा लेगा मजदूर अपने हाथ ऊपर,
उसी दिन थम जाएगा यह अर्थचक्र वहीं पर।
