आईना--दो शब्द
आईना--दो शब्द
.
घूर कर न देखो
आईना यूं बार बार,
उम्र की लकीरों को लाख
कोशिश से न छुपा पाओगी
एक बार मेरी
नजरों से देखो कल जैसी थी,
आज भी और कल भी वैसी ही नजर आओगी-
ये मोहब्बत का आईना
महबूब को अपना फरिश्ता बना देता है-
दिल के अहसासों में
तेरी खामियों से भी रिश्ता बना देता है-
जब थमने लगेगी
तुम्हारी रफ्तार - ए-जिंदगी
नजरों के सामने मुझे ही तब भी पाओगी-
एक बार मेरी
नजरों से देखो कल जैसी थी,
आज भी और कल भी वैसी ही नजर आओगी-
ये दिल का आईना है
दाग-ए-मेहताब को भी छुपा लेता है-
जानता है कि हकीकत उसकी
फिर भी इंतजार - ए-इश्क में जज्बात बहा देता है-
मोहब्बत के इस आईने में
रूप की नहीं दिल की परिछायी नजर आयेगी-
जब तुम प्यार से देखोगी
बस मोहब्बत ही नजर आयेगी-
जब भी करोगी
दीदार - ए-इश्क का
अहसासों के अक्स में ही डूब जाओगी-
एक बार मेरी
नजरों से देखो कल जैसी थी,
आज भी और कल भी वैसी ही नजर आओगी-
घूर कर न देखो
आईना यूं बार बार,
उम्र की लकीरों को लाख
कोशिश से न छुपा पाओगी
एक बार मेरी
नजरों से देखो कल जैसी थी,
आज भी और कल वैसी ही नजर आओगी।

