कलम उठाने दो
कलम उठाने दो
कलम उठाने दो-28/2/26
मत रोको तुम मन के भाव,अब बन सरिता बह जाने दोक
कलम उठाने दो लेखक को, अनकहा रहा,कह जाने दो
कितना दर्द और गम का आलम,स्याही के रंग रगां नहीं
कितनी भाव - भावनायें भी जो,व्यक्त ना हो पायी कहीं
कितनी दिल की बातें जो, कहते -कहते भी अधर रूके,
कितनी अरमानों की गाथायें , रही जमीं वो पिघली नहीं
सोये सोये जो थे आज तक ,उन्हें भी आज जग जाने दो
कलम उठाने दो लेखक को, अनकहा रहा कह जाने दो
गर कलम जो मौन रही,कौन लिखेगा फिर इतिहासों को
दिल मे उठती भावनाओंऔर अंगड़ाई लेते अहसासों को
कैसे प्रहार कोई कबीरा,इन करेगा दकियानूसी सोचों पर,
कैसे कोई रचेगा फिर भला ,फसानों और अफसानों को
बुझी राख के ढेरों में से फिर से,अंगारों को सुलगाने दो
कलम उठाने दो लेखक को , अनकहा रहा कह जाने दो
कलम लिखे शब्दों में है शक्ति,बदल देती है निजामों को
कलम ही तो देती है पहचान हमारे, साहित्यिक नामों को
कलम की स्याही गर पावन है,पावन करती गंगा जल सी,
गर बिक जाती कलम कहीं ,कौन याद रखेगा कामों को
शब्दों का मत करो दमन तुम , शब्द ज्वाला जग जाने दो
कलम उठाने दो लेखक को , अनकहा रहा कह जाने दो
राजीव रावत
