STORYMIRROR

प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

Drama

2  

प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

Drama

आई कोंपलें

आई कोंपलें

1 min
789


यूँ यकायक

जागी संवेदनाएँ

टहनी के भीतर

फिर क्यों हुई

अजब सी बेचैनी

आई नयी कोंपल।


कोंपलें आई

मिला है अवसर

ठूँठ को हँसने का

उपेक्षित था

मिल गया बहाना

फिर उसे जीने का।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Drama