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प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

Abstract


5.0  

प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

Abstract


दीप जो जला

दीप जो जला

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दीप जो जला

उजली हुई राहें

अग जग सँवरा ।


जलता रहा

प्रकाश गीत गाता

तम दूर भगाया

प्रीत की टोह

रोशन हुआ जग

हारी निविड़ निशा ।


पतंग जला

दीप से मिल जाना

प्रेम की पराकाष्ठा

हाय.. अर्पण

कैसा ये समर्पण

मन जान न पाया ।


सिसक रहा

था, रात भर जागा

थका, दिन में सोया

कोने दुबक

मधुर स्मृति स्वप्न

संजो रहा अकेला । 


  


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