STORYMIRROR

Seeta B

Abstract Inspirational

4  

Seeta B

Abstract Inspirational

मनचाहा से अनचाहा

मनचाहा से अनचाहा

6 mins
1.8K

राहुल आज अपनी उम्र के उस मोड़ पर है जिसे हम वृद्धावस्था कहते हैं। याने अपनी उम्र के 60 साल पूरे कर लिए हैं। आज भी अपने ही जीवन को लेकर उसे संतुष्टता कम और निराशा ज्यादा है।

जीवन में इतना कुछ करने की कोशिश या बहुत बार करने से पहले ही हार मान ली। यह सब उसने पहले कभी नहीं सोचा कि वह इस तरह का व्यवहार करता है। कोशिश से पहले ही हार मान लेता है। पर अब सोचने लगा है अपने ही जीवन के पन्ने देखने लगा है।

कोई और अपना कितना भी अपना हो, आपको कुछ भी कहे पर जब तक आप स्वयं नहीं समझना चाहते, समझ नहीं पाओगे, अनुभव तो बहुत दूर है। 

आज वो अपनी पूरी जिंदगी को मानो स्वयं साक्षी होकर देखने की कोशिश कर रहा है। जन्म तो एक समृद्ध परिवार में हुआ। हर सुख सुविधा देने की काबिलियत रखते थे माता-पिता। राहुल के जन्म के वक्त उसकी मां बहुत डरी हुई थी इतना डर कि उन्हें लगता था बच्चे के जन्म के साथ उनकी मृत्यु हो जाएगी, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ बच्चा और माँ दोनों स्वस्थ थे। और फिर राहुल के जन्म के 2 साल बाद जन्म हुआ रमा का, राहुल की छोटी बहन। अब दोनों बच्चे बड़े होने लगे स्कूल जाने लगे। माँ अपना घर संभालने में तो पिता अपने व्यवसाय में व्यस्त रहने लगे। बच्चों की जरूरते तो पूरी हो जाती पर अपनापन, वह ध्यान, उनकी दिनचर्या में रुचि लेना, उनके अभ्यास के बारे में रुचि, यह सब शायद नहीं था।

राहुल आज सब याद कर रहा है कि उन्हें टयूशन की फिस तो मिल जाती, पर कभी किसी ने यह नहीं पूछा उन्हें कौन से विषय अच्छे लगते हैं और कोनसे नही। बस ऐसे ही बचपन बित गया। सब सुविधाएं मिलती पर वो अपनापन कहीं कोई कमी बनाए हुए था।

राहुल कॉलेज में आ गए। पढ़ाई में ज्यादा रुचि नहीं थी, जैसे तैसे डिग्री पूरी की। अब पिता के साथ काम करने लगे तो हमेशा पिता के साथ मतभेद होने लगे। घर में भी हमेशा माता पिता के बीच मतभेद होते देखा बचपन से, इसलिए मानो कहीं कोई कमी रह गई थी पर क्या है वह कमी कभी सोचा नहीं, कभी समझने की कोशिश नहीं की। दोस्तों के बीच भी हमेशा मजाक के पात्र बने रहे। इसलिए किसी से खास मित्रता नहीं हुई, हमेशा कुछ दूरी बनाए रखते उनसे। 

जो माहौल बचपन से देखा उसी में उलझ गए और उससे बाहर निकल कर कभी देखने की कोशिश ही नहीं की। दोस्तों के साथ कभी कभार बैठ कर बातें करते हैं, पर इस विषय में कभी किसी से कोई बात नहीं की। अपने आप को बचाने के चक्कर में इतना उलझ गए कि खुद को कहां खो दिया पता ही नहीं चला। बस ऐसे ही चलता रहा छोटी बहन की भी शादी हो गई। पर उसका इतना आना जाना है घर में मानो शादी हुई है या नहीं यही पता नहीं चलता। 

कुछ समय बाद राहुल की भी शादी तय हो गयी। परिवार ने लड़की को पसंद किया। राहुल ने भी हां बोला। हो गई शादी। एक पढ़ी-लिखी, विचारों से स्वतंत्र लड़की थी अवनी।

अवनी की माता पिता नही थे और भाई बहन की शादी हो गई थी सभी अपने अपने परिवार में खुश थे, बस अवनी थी सबसे छोटी। अवनी खुश थी इस रिश्ते से। बाकी लड़कियों की तरह ही उसके भी कुछ सपने थे, वो और अधिक खुश थी कि उसे अब फिरसे माता पिता का प्यार मिलेगा।

पर शादी के कुछ दिन बाद ही पता चल गया यहां तो कोई किसी का नहीं है। उसकी सोच, उसकी भावनाओं को कभी ना राहुल ने समझा ना उसके माता-पिता ने ध्यान दिया। अवनी के लिए यह सब एक सोने के पिंजरे की तरह था, जहाँ खा पी सकते हैं पर विचारों की कोई स्वतंत्रता नहीं थी।

अवनी जब इन से परेशान होने लगी तब राहुल ने भी ध्यान नहीं दिया। इस बीच अवनी को समझ आ गया था पिता अपने व्यवसाय में राहुल की भी कभी नहीं सुनते बल्कि हमेशा उसे सबके सामने नीचा दिखाते रहते हैं।

अवनी ने आखिर घर छोड़ने की बात की। पर किसी ने ध्यान नहीं दिया, ना कभी बात करने की कोशिश की या फिर समझने की कोशिश की कि उसे क्या परेशानी है। उल्टा उसे हीं कहते, कहां जाओगी तुम्हारा है ही कौन? आखिर अवनी ने राहुल को बोला अगर वह इस बारे में कुछ नहीं करेंगे तो वह चली जाएगी। राहुल ने कुछ नहीं किया, अवनी चली गई।

राहुल के माता-पिता ने कभी कोई कोशिश नहीं की उसे वापस बुलाने की, राहुल ने भी कोशिश नहीं की। हमेशा चाहता कि लड़की घर छोड़ कर आई है तो सहना तो उसे ही चाहिए। जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार करना चाहिए। इसे ही तो निभाना कहते हैं। शादी से पहले भी राहुल ने कभी भी अवनी को अपने घर के वातावरण के बारे में नहीं बताया था।

एक-दो साल अवनी से बातचीत का सिलसिला जो कभी कभार होता था अब बंद हो गया। माता-पिता हमेशा कहते रहते, कहां जाएगी वापस यहीं आना है उसे। आराम से खाने-पीने मिल रहा है यहां पर। इसी चक्कर में राहुल ने कभी कोशिश नहीं की। उसे भी बहाना मिल गया था।

अब इतने साल बाद जब उसे याद आ रहा है कि अवनी उस का साथ देना चाहती थी। वह चाहती थी सब लोग राहुल का सम्मान करें। पिता के साथ जिम्मेदारी लेकर काम करें या फिर अपना कोई अलग व्यवसाय करें, पर राहुल ने कभी नहीं समझा। नतीजा यह कि आज अवनी कहां है पता नहीं। पर राहुल अकेला क्योंकि माता-पिता के गुजरने के बाद बहन ने भी मिलना बंद कर दिया। दोस्तों से तो वैसे ही कोई नज़दीकियां नहीं थी। जैसे-तैसे जिंदगी कट रही है।

आज भी यह सब सोचते समय राहुल को यही लगता है कि अगर माता-पिता ने बचपन से हमारी ओर ध्यान दिया होता तो? पिता ने उसे व्यवसाय में शामिल किया होता तो? या कोई और व्यवसाय शुरू करके दिया होता तो? मां ने भी अवनी की कभी नहीं सुनी अगर सुन लेती तो? अवनी को मुझे छोड़कर नहीं जाना चाहिए था। अब भी उसे सब में कमियां दिखाई दे रही है। वह अब भी खुद को कम और बाकी लोगो को ज्यादा दोषी मान रहा है इन सबके लिये।

उसने खुद भी तो खुद को इन सब से बांधे रखा। ना दोस्तों से कुछ सीखा, ना दुनिया से कुछ सीखा। ना इस बात का शुकराना किया कि उसके माता-पिता उसे सब सुख सुविधाएं तो दे रहे थे। पता था पिता का स्वभाव तो अपनी पढ़ाई पूरी कर खुद के लिए अपने दम पर ही कुछ सोच लिया होता। शादी के बाद भी जब अवनी साथ देना चाहती थी राहुल ने एक भी कदम उसकी और नहीं बढ़ाया। वह कभी अपने सुविधा के दायरे से निकलना ही नहीं चाहता था और अब जाकर फुर्सत निकाली है। 

इसलिए ठीक ही कहते हैं - जीवन कोई फिल्म नहीं कि अंत में सब समझ जाएंगे और सुखद अंत होगा। यही इंतजार करते रहे तो जीवन का अंत कब कहाँ कैसा होगा पता नहीं चलेगा। वक्त की कदर वक्त पर करना जरूरी है। वरना बिना मकसद के बचपन से कब 55 पार कर जाएंगे पता नहीं चलने वाला।


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Abstract