आकुलता
आकुलता
तेरी आकुलता से,
मेरी व्याकुलता बढ़ जाती !
तेरे मन की व्यथा,
मौनता से व्यक्त करती !
ऐसी गाथा,
जैसे भार से दबा वट वृक्ष !
विशालता उसकी,
अदम्य सहास से दृश्यती !
जो युगों-युगों से,
उन पृष्ठों को लिखता रहा !
एक पुन: उभरती,
नव पीढ़ी के नव प्रबल नव राग में !
जो स्वर राग का लय,
तेरी आकुलता में बनता !
मेरी व्याकुलता की संगत में,
नव अंकुरित जीवन होता !
